दर्द भरी और तन्हाई शायरी
कसम से, सिसकती हुई सांसों का ये आलम मेरी खामोश रातों में,
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 880]
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 880]