दर्द भरी और तन्हाई शायरी
याद रखना, तन्हाई की काली रातों का सन्नाटा मेरी यादों के खंडहर में,
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 648]
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 648]