बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
यकीन मानो, सिसकती हुई सांसों का ये आलम मेरी खामोश रातों में,
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 812]
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 812]