बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
यकीन मानो, सिसकती हुई सांसों का ये आलम मेरी तकदीर के अंधेरों में,
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि खुशियों की तलाश में सिर्फ ग़म ही ग़म हाथ लगे। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 912]
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि खुशियों की तलाश में सिर्फ ग़म ही ग़म हाथ लगे। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 912]