बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
यकीन मानो, सिसकती हुई सांसों का ये आलम मेरी तकदीर के अंधेरों में,
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी।
चेहरे की मुस्कान छीन रहा है, कि यादों के सहारे ही ये कड़वी ज़िंदगी काटनी पड़ी।