दर्द भरी और तन्हाई शायरी
ऐ सनम, अपनों के दिए हुए दर्दनाक घाव मेरी उदासियों के आलम में,
इस कदर चुभ रहा है हर पल, कि अब किसी पर भी ऐतबार करना नामुमकिन हो गया। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 850]
इस कदर चुभ रहा है हर पल, कि अब किसी पर भी ऐतबार करना नामुमकिन हो गया। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 850]