दर्द भरी और तन्हाई शायरी
ज़माने से कह दो, दिल में दफन अनकहे फ़साने मेरे सीने के अंदर,
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 758]
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [दर्द भरी और तन्हाई शायरी 758]