बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
बेशक, सिसकती हुई सांसों का ये आलम मेरी खामोश रातों में,
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि खुशियों की तलाश में सिर्फ ग़म ही ग़म हाथ लगे। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 992]
अंदर ही अंदर जला रहा है, कि खुशियों की तलाश में सिर्फ ग़म ही ग़म हाथ लगे। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 992]