बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
हकीकत यही है, उम्मीदों के टूटने की ये सदा मेरी उदासियों के आलम में,
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब किसी पर भी ऐतबार करना नामुमकिन हो गया। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 926]
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब किसी पर भी ऐतबार करना नामुमकिन हो गया। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 926]