बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
बस इतना समझ लो, टूटे हुए दिल का ये दर्द मेरी तन्हाई की महफ़िल में,
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 898]
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 898]