मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ ग़ालिब सिर्फ़ एक शायर नहीं, बल्कि उर्दू अदब के वो सूरज हैं जिसकी रोशनी कभी मद्धम नहीं पड़ी। ग़ालिब के कलाम में इंसानी फ़ितरत, ज़िंदगी की कशमकश, इश्क़ का दर्द और ख़ुदा से शिकवे-गिले इतने नायाब अंदाज़ में मिलते हैं कि हर दौर का इंसान उन्हें अपना समझता है।

ग़ालिब की शायरी की ख़ासियत

ग़ालिब ने रवायती शायरी से हटकर ऐसे विषयों पर शेर कहे जो सोचने पर मजबूर कर देते हैं। उनके अल्फ़ाज़ में सादगी भी है और फ़ारसी की नफ़ासत भी।

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,
बहुत निकले मिरे अरमाँ लेकिन फिर भी कम निकले।