जौन एलिया की शायरी को समझना हर किसी के बस की बात नहीं। उनका अंदाज़-ए-बयां इतना जुदा और बागी था कि महफ़िलें उनके शेर सुनकर सन्न रह जाती थीं। उन्होंने कभी अपने दर्दों को सजाकर नहीं पेश किया, बल्कि जो था उसे उसी बेबाकी से कह दिया।

मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बस,
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं।