🇮🇳 बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
हर घड़ी, जुदाई का ये कड़वा ज़हर मेरी भीगी आँखों में,
खामोशी से रुला रहा है, कि दिल के ज़ख्मों को छिपाकर मुस्कुराना ही दस्तूर बन गया। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 945]
खामोशी से रुला रहा है, कि दिल के ज़ख्मों को छिपाकर मुस्कुराना ही दस्तूर बन गया। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 945]