🇮🇳 बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
ज़माने से कह दो, उम्मीदों के टूटने की ये सदा मेरी उदासियों के आलम में,
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 746]
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 746]