🇮🇳 बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
बेशक, अपनों के दिए हुए दर्दनाक घाव मेरी उदासियों के आलम में,
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई।
उम्र भर का नासूर बन गया है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई।