🇮🇳 बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
बेशक, अपनों के दिए हुए दर्दनाक घाव मेरे सीने के अंदर,
इस कदर चुभ रहा है हर पल, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 642]
इस कदर चुभ रहा है हर पल, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 642]