🇮🇳 बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी
हर घड़ी, दिल में दफन अनकहे फ़साने मेरी तन्हाई की महफ़िल में,
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 970]
सांसों को भारी कर रहा है, कि अब रोते हुए भी मुस्कुराना हमारी मजबूरी बन गई। [बेवफ़ा और बिछड़ने की शायरी 970]