🇮🇳 ग़ज़ल और नज़्म
खामोशियों के दरमियां, तेरी बाहों का ये आशियाना मेरी ज़िंदगी के सफर में,
इबादत की तरह पावन हो गया है, कि अब तेरे इश्क में ही जीना और मरना मंजूर है।
इबादत की तरह पावन हो गया है, कि अब तेरे इश्क में ही जीना और मरना मंजूर है।